अमेरिका-तालिबान शांति समझौता- दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर ले गया रोटी, जानिए पाकिस्तान को कैसे हुआ फायदा।

बराक ओबामा आज सत्ता में नहीं हैं, लेकिन दुनिया का सबसे शक्तिशाली आदमी बराक ओबामा बनना चाहता है। जी हां, डोनाल्ड ट्रम्प ओबामा बनना चाहते हैं। 2009 में नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले अश्वेत अमेरिकी राष्ट्रपति थे ओबामा। अब ट्रम्प हर कीमत पर नवंबर 2020 में होने वाले चुनाव से पहले इसे पाना चाहते हैं। वो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में शांति को बेचने की कोशिश कर रहे हैं। वो शांति के नाम पर अपना व्यापार कर रहे हैं।

उन्होंने कुछ हफ्ते पहले मध्य-पूर्व में एकतरफा शांति समझौते की घोषणा की, लेकिन फलस्तीनियाें ने उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इसके बाद उन्होंने अफगान तालिबान के साथ शांति समझौते के लिए पाकिस्तान का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया।

दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर ले गया रोटी…ये कहावत तो आपने सुनी होगी..है ना…तो चलिए इस अमेरिका-तालिबान शांति समझौता की बारीकियों को समझने के लिए…ये वीडियो आपको दिखाते हैं।  

29 फरवरी 2020: कतर की राजधानी दोहा में  को अमेरिका – तालिबान के बीच शांति समझौते पर हस्ताक्षर हो गए। हालांकि अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी इस सीन में नजर नहीं आए। वहीं, अमेरिका और तालिबान के बीच हुए शांति समझौते से पाकिस्तान बेहद खुश दिख रहा है। इसकी वजह ये है कि पाकिस्तान इस समझौते में अपना फायदा देख रहा है। पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच करीबी रिश्ते रहे हैं, जबकि अफगानिस्तान की अशरफ गनी सरकार से पाकिस्तान की तनातनी हमेशा से रही है।अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी आतंकवाद के लिए हमेशा पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। अशरफ गनी अंतरराष्ट्रीय मंच से भी पाकिस्तान को निशाने पर लेते रहे हैं, साथ ही अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी के भारत के साथ अच्छे रिश्ते भी रहे हैं। अशरफ गनी की भारत से दोस्ती पाकिस्तान को चुभती रही है ये भी सच है।

अमेरिका ने 2001 में किया था अफगानिस्तान में हमला
11 सितंबर 2001 के आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में हमला किया था और तालिबान सरकार को उखाड़ फेंका था। उस समय से तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता से बाहर रहा है। करीब 18 साल तक चली जंग के बाद अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौता हुआ। इस समझौते पर हस्ताक्षर के बाद अमेरिका ने साफ कहा कि तालिबान को अलकायदा और दूसरे आतंकी संगठनों से अपने रिश्ते खत्म करने होंगे। तालिबान अफगानिस्तान की धरती को आतंकियों की पनाहगाह नहीं बनने देगा।

अमेरिका-तालिबान शांति समझौते पर अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि जालमे खलीलजाद और तालिबान के कमांडर मुल्ला अब्दुल गनी बरादर ने हस्ताक्षर किए। इस दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और रक्षा मंत्री मार्क एस्पर भी मौजूद रहे।

तालिबान हुआ पाकिस्तान का शुक्रगुजार
पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी समेत 30 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि भी अमेरिका-तालिबान शांति समझौते के गवाह बनें। पाकिस्तान ने अमेरिका-तालिबान शांति समझौते का स्वागत किया। वहीं, तालिबान ने अमेरिका के साथ हुए इस समझौते के लिए पााकिस्तान का शुक्रिया अदा किया। अफगानिस्तान में विकास और शांति के लिए पाकिस्तान मदद करेगा। अमेरिका और अफगान सरकार तालिबान के 5,000 कैदियों को रिहा करेंगे, जिसके बदले तालिबान अफगान सरकार के 1,000 कैदियों को छोड़ेगा। 

अमेरिका-तालिबान शांति समझौते पर भारत क्या बोला?
भारत हमेशा से अफगानिस्तान की शांति और विकास का हिमायती रहा है। अफगानिस्तान के विकास में भी भारत सहयोग करता रहा है। लिहाजा भारत ने अफगानिस्तान में शांत कायम करने के मकसद से किए गए इस समझौते का समर्थन किया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा कि “भारत उस हर अवसर का समर्थन करता है, जो अफगानिस्तान में शांति, सुरक्षा और स्थिरता ला सकते हैं। साथ ही आतंकवाद को खत्म कर सकते हैं।”

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