एलेक्जेंडर फ्लेमिंग ही वो इंसान हैं, जिसने दुनिया को जादुई दवा दी…दवा और खोज कि कहानी जानिए?

हमारी दुनिया को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनाने में साइंटिस्ट और आविष्कारकों की अहम भूमिका रही है। दिग्गज बायोलॉजिस्ट और पेनिसिलिन के आविष्कारक एलेग्जेंडर फ्लेमिंग भी उन कुछेक साइंटिस्ट में शुमार किए जा सकते हैं, जिनकी वजह से हम खुशनुमा जिंदगी गुजर-बसर कर रहे हैं। एलेग्जेंडर फ्लेमिंग एक ऐसा नाम जिसने विज्ञान कि दुनिया में एक क्रांति लाई।अलेक्जेंडर फ्लेमिंग विश्व के पहले वैज्ञानिक थे, जिन्होंने सन् 1928 में पेनिसिलिन का आविष्कार करके संक्रामक रोगों से लड़ने और उन पर काबू पाने का रास्ता दिखाया। पेनिसिलिन ही पहली एंटीबायोटिक दवाई थी। जिससे कई लाइलाज बीमारियों का इलाज संभव हुआ। संक्रमक रोगों के उपचार में ये रामबाण साबित हुआ।

वैसे हम आपको बता दें कि पेनिसिलिन का आविष्कार अचानक ऐसे ही हुआ, अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने इसके पीछे बेहिसाब मेहनत की। इसकी खोज के पीछे कि कहानी 2D एनिमेशन में और उनके अविष्कार को समझने के लिए ये वीडियो जरुर देखें।

कैसे किया अचानक जादुई दवा कि खोज
एलेग्जेंडर फ्लेमिंग Alexander Fleming एक दिन अचानक बाहर से आए तो देखा पेट्रीडिश पर हरे रंग कि फंफूदी लग गई थी। जो बड़ी अजीब थी लेकिन फिर प्रयोग के दौरान देखा कि पेट्रीडिश पर फफूंदी आने से पेट्रीडिश के सारे बैक्टीरिया मर गए थे। ये फफूंदी पेनिसिलियम नोटाडम थी। इस प्रयोग को फ्लेमिंग ने बार-बार दोहराया। इससे पता चला कि इस फफूंदी से जीवाणु खत्म हो रहे थे। क्योंकि ये दवा पेनिसिलिन नोटाडम से प्राप्त की गई इसलिए इस दवा का नाम पेनिसिलिन रखा गया। फ्लेमिंग ने फफूंदी से रस निकालकर उसका दवा के रूप में इस्तेमाल शुरू किया। फिर अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने रस से एंटीबायोटिक को अलग किया।

पेनेसिलिन कि खोज को सदी की सबसे बड़ी खोज करार किया गया। बड़े स्तर पर पेनिसिलिन का उत्पादन मुश्किल था क्योंकि ये बेहद खर्चीला प्रोसेस था। ये दवा शरीर में ज्यादा समय भी नही रहती थी। फ्लेमिंग ने अमेरिका जाकर इसको पृथक करने की विधि को खोजा और वहां के दवा निर्माताओं के साथ मिलकर पेनिसिलिन का मास प्रोडक्शन शुरू किया।
फिर आगे जाकर फ्लेमिंग ने इस दवा का प्रयोग द्वितीय विश्वयुद्ध के घायल सेनिको पर किया था। पेनिसिलिन घायल सेनिको के उपचार में उपयोगी साबित हुई। 1970 तक इस दवा का भरपूर उपयोग किया गया था। इसके बाद इसका उपयोग बन्द हो गया। एंटीबायोटिक दवाई का उपयोग घाव को ठीक करने, इंफेक्शन, दर्द निवारक में किया जाता रहा है। इसका श्रेय फ्लेमिंग को ही जाता है क्योंकि उन्होंने ही सर्वप्रथम एंटीबायोटिक दवाई की खोज की थी।

एलेक्जेंडर फ्लेमिंग को पेनिसिलिन की खोज के लिए 1945 में नोबेल पुरस्कार भी मिला था। 11 मार्च 1955 को पेनिसिलिन के खोजकर्ता अलेक्जेंडर फ्लेमिंग की मृत्यु हो गई।

वर्तमान समय मे कई एंटीबायोटिक दवाइयां इस्तेमाल की जाती है-

पेनिसिलिन: त्वचा, दांत, कान, श्वसन तंत्र, मूत्र पथ के संक्रमण और सूजाक

सेफलोस्पोरिन: निमोनिया, स्ट्रेप गले, टॉन्सिलिटिस, स्टैफ, ब्रोंकाइटिस, ओटिटिस मीडिया

फ्लोरोक्विनोलोन: दस्त जैसे आम जीवाणु संक्रमण के खिलाफ इसका उपयोग होता है

टेट्रासाइक्लिन: पेप्टिक अल्सर, श्वसन तंत्र, हैजा, लाइम रोग, टायफस, यात्रा से डायरिया, मलेरिया, मुंहासे वल्गरिस और रोसैसिया

मैक्रोलाइड्स: ग्रसनीशोथ, साइनसाइटिस, ब्रोंकाइटिस, जननांग, जठरांत्र संबंधी मार्ग, त्वचा संक्रमण

एमिनोग्लाइकोसाइड्स: ग्राम-नकारात्मक बैक्टीरिया के कारण संक्रमण का इलाज करते हैं; स्ट्रेप्टोमाइसिन

एलेक्जेंडर फ्लेमिंग कि जिंदगी से जुड़ी कुछ खास बात-
एलेक्जेंडर फ्लेमिंग का जन्म 6 अगस्त 1881 को स्कॉटलैंड में हुआ था। फ्लेमिंग ने चिकित्सा विज्ञान में डिग्री प्राप्त की थी। एलेक्जेंडर फ्लेमिंग के पिता का नाम हफ फ्लेमिंग था। बचपन मे ही फ्लेमिंग के पिता की मृत्यु हो गई थी। माँ ने ही फ्लेमिंग की परवरिश की थी। अलेक्जेंडर फ्लेमिंग की प्रारंभिक शिक्षा लुइन मोर नामक स्कूल में हुई थी। फ्लेमिंग ने चिकित्सा शास्त्र की डिग्री सेंट मैरी हॉस्पिटल मेडीकल स्कूल से प्राप्त की थी। डिग्री प्राप्त करने के बाद फ्लेमिंग प्रतिजीवियो पर प्रयोग करने लगे। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान संक्रमण रोगों के कारण हजारो सैनिकों की मौत हुई थी। यही एक कारण था कि फ्लेमिंग ऐसी दवा की खोज के लिए अग्रसर हुए जो इन बीमारियों में कारगर साबित हो।

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