बीजेपी के किले में आम आदमी पार्टी की दस्तक, इस बार कौन मारेगा बाजी?

दिल्ली में 1993 से 2013 तक कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच बराबर टक्कर वाली सीट रही है। इस सीट से दोनों पार्टियों के उम्मीदवार दो-दो बार जीत हासिल करने में कामयाब रहे हैं। अन्ना आंदोलन के बाद 2015 के विधानसा चुनावों में इस सीट पर समीकरण बदल गया और एक तीसरे दल आम आदमी पार्टी ने यहां दस्तक दी और उसकी उम्मीदवार प्रमिला टोकस जीतने में कामयाब हुईं। हालंही में चुनाव की तारीखों के ऐलान के बाद इस बात पर चर्चा शुरू हो चुकी है कि 8 फरवरी को जब मतदाता वोट डालने EVM मशीनों तक पहुंचेंगे तो वे क्या फैक्टर हो सकते हैं, जिससे पता चले कि विजयी कौन होगा।

आज हम आफको 2 फैक्टर्स के बारे में बताएंगे। जिससे दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे तय होने की संभावना है। ये विश्लेषण पिछले चार चुनावों और 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद हुए एक सर्वे के आधार पर किए गए हैं।

जीत के ताज का पहला फैक्टर- क्या वोटिंग पैटर्न 2014-2015 के चुनाव वाला ही होगा?  अगर हम 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के पैटर्न को देखें तो दिल्ली के वोटरों ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों के दौरान अपना वोटिंग पैटर्न पूरी तरह से बदल दिया था। मसलन, जिन वोटरों ने 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 60 विधानसभा सीटों पर बढ़त दिलाई थी और आम आदमी पार्टी मुश्किल से 10 सीटों में आगे रही थी, उन्हीं मतदाताओं ने फरवरी, 2015 के चुनावों में भाजपा को केवल 3 सीटों पर समेट दिया और 67 सीटें आम आदमी पार्टी की झोली में डाल दिए। अब सवाल है कि क्या 2020 के चुनाव में दिल्ली के वोटर अपना वही वोटिंग पैटर्न दोहराएंगे? अगर, हां तो जीत किसकी है वो आप खुद अंदाजा लगा लिजिए।

जीत के ताज का दूसरा फैक्टर- कांग्रेस का प्रदर्शन? इस बार के दिल्ली विधानसभा चुनाव में नतीजों का दारोमदार काफी हद तक कांग्रेस के प्रदर्शन पर भी निर्भर करेगा। 2013 के विधानसभा चुनावों से लेकर 2019 के लोकसभा चुनावों तक के चुनाव परिणामों के विश्लेषण से पता चलता है कि आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन में उतार-चढ़ाव कांग्रेस के प्रदर्शन के भरोसे ही टिका रहा है। जब 2015 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन सबसे खराब रहा तो आम आदमी पार्टी ने ऐतिहासिक तरीके से 70 में से 67 सीटें जीत लीं। 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस फिर से 22.5% वोट लेकर 5 सीटों पर बढ़त बनाने में सफल रही तो आम आदमी पार्टी का वोट शेयर गिरकर 18.1% हो गया और ये उसका अबतक का सबसे खराब प्रदर्शन साबित हुआ। यानि अगर आने वाले चुनाव में कांग्रेस ने फिर से अपना प्रदर्शन अच्छा किया तो अरविंद केजरीवाल का खेल खराब हुआ समझो।

सबसे बड़ा सवाल, क्या करेंगे मुस्लिम वोटर? 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद हुए सीएसडीएस-लोकनीति के सर्वे से एक बात और जाहिर होती है कि मुस्लिम वोटरों का रुझान एएपी और कांग्रेस में से कांग्रेस की ओर बहुत बड़े पैमाने पर रहा। कांग्रेस और एएपी को मिले दलित वोटों का भी यही हाल रहा। जाहिर तौर पर बीजेपी को इस चुनाव में भी बहुत कम मुस्लिम वोटरों का ही साथ मिल सका। अब 11 फरवरी का चुनाव परिणाम इसी बात पर तय करेगा कि आम आदमी पार्टी क्या कांग्रेस के खाते में गए मुस्लिम और दलित वोटों को अपने खाते में लाने में कामयाब होगी? 

दिल्ली चुनाव 2020: जानिए 1993 से अब तक, कब किससे सिर पर सजा दिल्ली का ताज
विधानसभा चुनाव 2015
प्रमिला टोकस(आम आदमी पार्टी)- 54,645(57.97%)
अनिल कुमार शर्मा(बीजेपी)- 35,577 (37.74%)
लीलाधर भट्ट (कांग्रेस)- 4,042 (4.28%)
विधानसभा चुनाव 2013
अनिल कुमार शर्मा(बीजेपी)- 28,017 (33.17%)
शाजिया इल्मी (आम आदमी पार्टी)- 27,691(32.78%)
बरखा सिंह(कांग्रेस)- 19,679 (23.30%)
2013-2015 में चली थी केजरीवाल की लहर

बहरहाल, दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक एवं मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के समक्ष अपना सबसे मजबूत किला बचाने की प्रबल चुनौती है और वक्त ही बताएगा कि बाजी कौन मारेगा।

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