अमरीका ने लगाई, ग्रीनलैंड पर 100 मिलियन डॉलर की बोली!

विदेशी खबर: अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अपने अजीबो गरीब हरकत की वजह से आज कल सुर्खियों में छाए हैं। जी हां और वो बात है “ग्रीनलैंड” । जिसे ख़रीदने की इच्छा ट्रंप ने ज़ाहिर की है। उनका मानना था कि अमरीका दुनिया के सबसे बड़े द्वीप को ख़रीद ले तो उन्हें अच्छा लगेगा।

ट्रंप के इस बयान पर कई लोगों ने अपनी-अपनी राय दी
अमरीकी रेडियो ओनपीआर पर डेनमार्क के लिए पूर्व अमरीकी राजदूत रूफ़स गिफोर्ड कहते हैं, “मुझे इतनी हंसी आई कि मेरी आंखों में पानी आ गया।”
अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार ट्रंप का ये कहना कि “उत्तर अटलांटिक और आर्कटिक के बीच के इस द्वीप को अमरीका को खरीदना चाहिए, ये बयान “थोड़ा संजीदा भी है और नहीं भी।”
ग्रीनलैंड के अधिकारियों ने भी  तुरंत की ट्रंप के बयान का उत्तर दिया है, “हम व्यवसाय के लिए खुले तैयार हैं, लेकिन हम बिकाऊ नहीं है।”

वैसे अमेरिका सदियों से जमीन की खरीदारी करता आ रहा है।
1803 में, इसने 15 मिलियन डॉलर में फ्रांस से “लुइसियाना” खरीदा;
1819: $ 5mn के लिए स्पेन से फ्लोरिडा खरीदा;
1856; “गडसेन खरीद” में मेक्सिको को $10 मिलियन देकर कुछ क्षेत्र खरीदे जो अब एरिज़ोना और न्यू मैक्सिको का हिस्सा हैं और $15 मिलियन, टेक्सास पर अपना दावा छोड़ने के लिए;
1867 में: “अलास्का” को रूस से $ 7.2 मिलियन में खरीदा गया था; सी साल अमेरिकी राष्ट्रपति एंड्रयू जॉनसन ने पहली बार ग्रीनलैंड खरीदने की कोशिश की!
और 1917 में, अमेरिका ने डेनमार्क से डेनिश वेस्ट इंडीज $ 25 मिलियन में खरीदा, जिसका नाम बदलकर “वर्जिन आइलैंड्स” कर दिया गया।

और बाकि दूसरे मुल्क भी खरीदते आएं हैं जमीन…
1878; स्वीडन से 3.2 लाख फ्रेंच फ्रैंक में वेस्ट इंडीज से कैरिबियाई द्वीपों में सेंट बार्थेलेमी खरीदा;
1899; जर्मनी ने स्पेन से कैरोलीन और मरीना द्वीप खरीदे;
1947; पूर्व USSR (रूस) ने 700 मिलियन फिनिश मार्का के लिए जानिसकोस्की-निस्कोकोस्की के फिनिश क्षेत्र को खरीदा;
1958; पाकिस्तान ने 5.5 अरब पाकिस्तानी रुपए में ओमान से ग्वादर बंदरगाह खरीदा था;
1991; चीन ने ताजिकिस्तान कुनलुन पर्वत से 1,000 वर्ग किमी पामीर पर्वतमाला खरीदा।

 
फिलहाल ये तो तय है कि चर्चा का मुद्दा जो कुछ भी हो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ये पहली बार नहीं हुआ है कि जब अमरीका ने ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा दिखाई है। अमरीका के ग्रीनलैंड को ख़रीदने की बात सबसे पहली बार 1860 के दशक में चर्चा में आई थी। उस वक्त एंड्र्यू जॉनसन अमरीका के राष्ट्रपति हुआ करते थे। 1867 में अमरीकी विदेश विभाग की एक रिपोर्ट आई थी जिसमें कहा गया था कि ग्रीनलैंड अमरीका के लिए रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण है। साथ ही यहां पर बड़ी मात्रा में संसाधन भी उपलब्ध हैं जिस कारण अमरीका इसे ख़रीद ले तो इसका लाभ होगा। इस रिपोर्ट में लिखा था कि “राजनीतिक तौर पर और व्यापार के लिए अमरीका को आइसलैंड और ग्रानलैंड को ख़रीद लेना चाहिए।”

बिज़नेस इनसाइडर में छपी एक ख़बर के अनुसार इसके सालों बाद पूर्व राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने डेनमार्क को ख़रीदने के लिए 10 करोड़ डॉलर (सोने में) की पेशकश की थी. आज के हिसाब से क़रीब 130 के बराबर होगी। 

औपचारिक तौर पर ग्रीनलैंड को खरीदने का सबसे पहला प्रस्ताव नवंबर 1945 को आया था। उस वक्त रिपब्लिक पार्टी से सीनेटर ने कहा था कि जरूरत पड़ने पर इसके लिए “सेना का इस्तेमाल भी किया जाना चाहिए।” 1940 के दशक के अंत में ट्रूमैन के प्रस्ताव को लेकर डेनमार्क की प्रतिक्रिया सकारात्मक नहीं थी। लेकिन साल 1950 तक अमरीका इस तरह के आदेश हासिल करने में कामयाब रहा जिसके तहत वो ग्रीनलैंड में अपना एक सैन्य अड्डा बना सकता था। ये शीत युद्ध की शुरुआत से ठीक पहले की बात थी। अमरीका के समुद्रतट से काफ़ी दूर स्थित उत्तर में मौजूद अमरीकी सेना का टूली हवाई अड्डा, इस बात की गवाही देता है कि अमरीका के लिए ग्रीनलैंड आज भी बेहद अहम है।

सच कहें तो चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के बीच अमरीका में कई लोग ट्रंप के इस बयान का समर्थन करते हैं कि ग्रीनलैंड को अमरीका के कब्ज़े में लाया जाना चाहिए।

आर्कटिक सर्कल से बीजिंग की दूरी 3,000 किमी. (1,800 मील) है लेकिन चीन वहां निवेश के नए आयाम ढूंढ़ रहा है. आर्कटिक की बर्फ़ से सामान की आवाजाही के रास्ते बनाने के लिए कई आइसब्रेकर्स (बर्फ़ पर चलने वाले जहाज़) चीन ने ख़रीद लिए हैं या वहां भेज दिए हैं। इनमें परमाणु शक्ति से चलने वाले आइसब्रेकर्स भी शामिल हैं। इस काम को अंजाम देने के लिए चीन की नज़र ग्रीनलैंड पर है। यहां चीन अपने पोलर सिल्क रोड पर स्टेशन बनाने की संभावनाएं ढूंढ़ रहा है।

अमेरिका कि निगाहें ग्रीनलैंड पर क्यों हैं?
ग्रीनलैंड दुनिया का बारहवां सबसे बड़ा भूभाग और दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप।
ये एक भूभाग यूनाइटेड किंगडम से क़रीब दस गुना बड़ा है।
20 लाख वर्ग किलोमीटर का ये इलाका पत्थरों से भरा हुआ है और बर्फ़ की चादर से ढका रहता है।
यहां की जनसंख्या काफ़ी कम है। इस बड़े भूभाग में मात्र 57 हज़ार लोग रहते हैं।
ग्रीनलैंड एक स्व-शासित देश है लेकिन ऊपरी तौर पर डेनमार्क का उस पर नियंत्रण है। ग्रीनलैंड के पास अपनी अलग सरकार है।
ग्रीनलैंड के बजट का दो तिहाई हिस्सा डेनमार्क देता है। बाक़ी की आय का मूल स्रोत मत्स्य उद्योग है।
ग्रीनलैंड के प्राकृतिक संसाधन, जैसे कोयला, तांबा, जस्ता और लौह-अयस्क है जिस कारण कई कंपनियों की दिलचस्पी इस इलाके में है।
ग्रीनलैंड में आत्महत्या और शराबखोरी के मामले बहुत अधिक है। इसके साथ ही यहां बेरोज़गारी भी चरम पर है।
माना जा रहा है जलवायु परिवर्तन का सीधा असर ग्रीनलैंड पर पड़ रहा है. यहां जमी बर्फ़ की चादर तेज़ी से पिघल रही है जिस कारण यहां की ज़मीन के नीचे के प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच की उम्मीद भी बढ़ रही है।

आज कि तारीख़ में, ग्रीनलैंड की जमा अधिकांश खनिज तक पहुंचना मुश्किल है, क्योंकि वो मोटी बर्फ की चादरों के नीचे ढंका हुआ है, जो 81% द्वीप पर छाया हुआ है; लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के कारण पिघलते बर्फ की वजह से, भविष्य में उन तक पहुंचना आसान जरुर हो सकता है। ग्रीनलैंड की 1 अगस्त 2019 के दिन, 24 घंटे में ही, 1100 करोड़ टन बर्फ की चादर पिघल गई, जो 1950, जबसे डेटा रखा गया है, के बाद से सबसे ज्यादा है; इतना बर्फ पिघला कि वो पूरे फ्लोरिडा को 5 इंच पानी में डालने के लिए काफी था।

खैर, अबतक ये देश सिर्फ इस लिए जाना जाता था क्योंकि उनका हिमखंड यानी आइसबर्ग, जो जैकबशवन ग्लेशियर का हिस्सा था, 1912 में टाइटैनिक के डूबने का कारण बना था…औैर अब टठिक सौ सालों बाद ये एक बार फिर से सुर्खियों में छा रहा है; लेकिन इसबार विडंबना ये है कि ग्रीनलैंड का रणनीतिक प्रभाव तब ही बढ़ता है…जब ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती है!

 

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