क्या हिन्दुस्तान में हिन्दू माइनॉरिटी में हो सकते हैं? इसका जवाब बहुत ही सीधा लेकिन उलझा हुआ है!

कुछ वक्त पहले एक मुद्दा देखते ही देखते नेशनल बहस का हिस्सा बन गया…वो शब्द है “माइनॉरिटी”। जी हां सुप्रीम कोर्ट में एक PIL दाखिल कर मांग की गई है कि 8 राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जाए। इस याचिका के बाद बहस तेज हो गई है कि आखिर इस मांग की वजह क्या है? क्या हिंदुओं को भी कुछ राज्यों में अल्पसंख्यक का दर्जा देना सही है?

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कोर्ट में जो याचिका दाखिल हुई है, उसमें कहा गया है कि आठ राज्य यानी लक्षद्वीप, मिजोरम, नगालैंड, मेघालय, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और पंजाब में हिंदुओं की जनसंख्या बेहद कम है, उन्हें यहां अल्पसंख्यक का दर्जा मिले ताकि सरकारी सुविधाएं मिल सकें। अपील में कहा गया कि अल्पसंख्यक का दर्जा नहीं मिलने से इन राज्यों में हिंदुओं को बुनियादी अधिकारों से वंचित होना पड़ रहा है।

तो आखिरकार धर्मनिरपेक्ष शब्द संविधान में आया कहां से? भारत के “आपातकाल” की अवधि (1975-77) के दौरान, जब संविधान और सभी मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था, उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री, इंदिरा गांधी ने, 42वें संशोधन द्वारा “समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष” शब्दों को संविधान में डाला।

अल्पसंख्यक होने के फायदे सरकार की तरफ से मदद
भारत सरकार हर साल 20 हजार अल्पसंख्यकों को टेक्निकल एजुकेशन में स्कॉलरशिप देती है। ये स्कॉलरशिप इन आठ राज्यों में हिंदुओं को नहीं मिल पाती। जबकि जम्मू-कश्मीर में 68.30 फीसदी मुस्लिम हैं, वहां सरकार ने हाल में 753 में से 717 मुस्लिम स्टूडेंट्स को स्कॉलरशिप दी। इस राज्य में हिंदू स्टूडेंट्स मुस्लिमों से कहीं कम हैं, लेकिन उन्हें स्कॉलरशिप का लाभ नहीं मिला। 

अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार
भारतीय संविधान में धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों को अनुच्छेद 29 और 30 में विशेष अधिकार दिए हैं ।
अनुच्छेद 29(1) के अनुसार किसी भी समुदाय के लोग जो भारत के किसी राज्य मे रहते हैं या कोई क्षेत्र जिसकी अपनी आंचलकि भाषा, लिपि या संस्कृति हो, उस क्षेत्र को संरक्षित करने का उन्हें पूरा अधिकार होगा। ये प्रावधान जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 के तहत है ।
अनुच्छेद 30(1) के तहत सभी अल्पसंख्यकों को धर्म या भाषा के आधार पर अपनी पसंद के आधार पर अपनी शैक्षिक संस्था को स्थापित करने का अधिकार है।
संविधान में अल्पसंख्यक शब्द को परिभाषित  नहीं किया गया है
संविधान के अनुच्छेद 25 से लेकर 30 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता, शैक्षणिक व सांस्कृतिक अधिकार मिले हुए हैं। इन अधिकारों के तहत सरकार अल्पसंख्यक समुदाय के शैक्षणिक, सांस्कृतिक और सामाजिक उत्थान के लिए काम करती है। याचिका में कहा गया है कि केंद्र सरकार का 1993 का नोटिफिकेशन रद्द किया जाना चाहिए। अल्पसंख्यक घोषित करने के लिए गाइडलाइंस तय की जानी चाहिए। आठ राज्यों में जहां हिंदुओं की संख्या कम है उन्हें वहां अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जाना चाहिए।

मांग के पीछे का तर्क और वितर्क
याचिका दायर करने वाले अश्विनी उपाध्याय का मानना है, ‘सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने 2002 में फैसला दिया था कि अल्पसंख्यक का दर्जा राज्य स्तर पर दिया जाना चाहिए। आठ राज्यों में हिंदू बहुत कम हैं, बावजूद इसके उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा नहीं दिया गया।
2011 में हुई जनगणना के मुताबिक-
लक्षद्वीप में 2.5%
मिजोरम 2.75%
नगालैंड में 8.75%
मेघालय में 11.53%
जम्मू कश्मीर में 28.44%
अरुणाचल प्रदेश में 29%
मणिपुर में 31.39% और
पंजाब में 38.4% हिंदू हैं।

अल्पसंख्यकों में कौन-कौन है शामिल
केंद्र सरकार ने 23 अक्टूबर 1993 को नैशनल कमिशन फॉर माइनॉरिटी ऐक्ट 1992 के तहत नोटिफिकेशन जारी किया था और इसके तहत पांच कम्युनिटी- मुस्लिम, क्रिश्चियन, सिख, बौद्ध और पारसी को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया। बाद में 2014 में जैन समुदाय को भी इस लिस्ट में शामिल किया गया है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अर्जी में सवाल उठाया गया है कि नैशनल कमिशन फॉर माइनॉरिटी की धारा 2(सी) के तहत न तो राज्य सरकार और न ही केंद्र सरकार ने आठ राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया है।

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