ज़िंदगी कि सांप सीढ़ी खेल में कैसे पंजाब से गैरकानूनी अप्रवासी, मेक्सिको द्वारा अमरीका में घुसते है!

2019, मैक्सिको-अमेरिका की सीमा; ल्यूकविल, एरिज़ोना से 27 किमी पश्चिम, जहां का तापमान 42 डिग्री सेल्सियस था और सोनोरान रेगिस्तान 2,60,000 वर्ग किमी बड़ा; अमेरिका में एरिज़ोना और कैलिफोर्निया से मेक्सिको के सोनोरा और बाजा कैलिफोर्निया राज्य में फैला हुआ। दोनों देशों के सीमाओं के बीच, कई-कई हिस्सों में अभी तक कोई दीवार नहीं खड़ी है। बस 3 फुट के लंबे धातु खंभे ज़मीन में गाड़े गए है, जो वाहनों को पार करने से रोकते हैं। यही कारण है कि मैक्सिको क्षेत्र से पार करने वाले अवैध प्रवासियों की संख्या में, भारत के नागरिक, अब पांचवें स्थान पर आ गए हैं!  साथ ही डोनाल्ड ट्रम्प की सख्त आव्रजन या इमिग्रेशन नीति ने भी, विडंबना से अमेरिका में घुसपैठ करने की तादाद को और बढ़ावा दिया है!
अवैध प्रवासियों की संख्या में, बेशक मेक्सिको नंबर एक पर हैं; नंबर दो पर ग्वाटेमाला, फिर होंडुरास और अल साल्वाडोर के नागरिक है। 

अवैध आव्रजन का कारोबार ₹2,50,000 करोड़ का धंधा है। आश्चर्य से, #पंजाब और #हरियाणा के नागरिक अब #मेक्सिकन की तरफ सीमा पार करने वाले पांचवें सबसे बड़े समूह हैं। देखिये 2D एनिमेशन में… कैसे होता है ये सब और कैसे वो जान पर बाज़ी लगाके, ‘सांप और सीढ़ी’ का खरतनाक खेल खेलते है।

भारत से अमेरिका जाने वाले अधिकांश अवैध आव्रजन पंजाब और हरियाणा से हैं, जो दक्षिण अमेरिकी, ‘डॉन्की फलाइट’ रास्ते का इस्तेमाल करते हैं। पहले वे क्विटो इक्ववाडोर के लिए उड़ान भरते है, जो भारत और 180 अन्य देश के नागरिको को, बिना वीज़ा प्रवेश करने की अनुमति देता है।

खर्च; करीब-करीब ₹60-70,000 रूपए।

क्विटो से प्रवासियों को कोलंबिया सीमा के निकटतम इक्ववाडोर का शहर, ‘टुल्कन’ पहुंचाया जाता हैं, जहां से वो कोलंबिया के पूर्वी किनारे, टर्बो शहर तक जाते है। फिर लंबी, खुली नावों में बैठकर, वे उरबा खाड़ी पार करके, कापूरगाना पहुंचते है, जो सरकार के कब्ज़े में कम, माफिया टोलियों के आदेशों पर ज्यादा चलता है। फिर ये ‘ट्रैवल एजेंट’, जो असलियत में अवैध तस्करी में धंधा करते है, उन्हें एक सप्ताह तक ‘डेरियान गैप’ के, 100 किमी घने जंगलों से पार करवाते है; ये जंगल मध्य और दक्षिण अमेरिका की सीमा मानी जाती है। लेकिन ये सब करना इतना आसान नहीं। अक्सर प्रवासी रास्ते में ही अपहरण हो जाते है या डकैत उनके सारे पैसे लूट लेते है। या तस्कर अचानक ज्यादा पैसों की मांग कर लेते हैं। जो उन्हें वापस कोपर्गेना लौटने पर मजबूर कर देता है और एक बार फिर अपनी किस्मत आजमाने के लिए, रिश्तेदारों से पैसों का इंतज़ार करते है । (वेस्टर्न यूनियन ऑफिस) जब प्रवासी ‘डेरिएन’ जंगलों को सफलता से पार कर लेते है, तो उन्हें टैक्सियों के द्वारा, पनामा सिटी भेजा जाता है। फिर बसों में छुपकर, वे कोस्टा रिका पहुंचते है। इक्वाडोर से कोस्टा रिका आने का खर्च? $1,900 डॉलर; जहां खाना-पीना…रहना…दवाई-दारु, अलग।

कोस्टा रिका की पुलिस हर प्रवासी पर, $35 डॉलर लेती है, दूसरी ओर देखने के लिए, जब टैक्सियों में झुंड आगे निकलकर, उस देश की पश्चिमी तट की ओर बढ़ते हैं। सूर्यास्त के बाद, नाव से तीन घंटे के सफर में, वे निकारागुआ के अधिकांश हिस्से से बचते हुए, सीधे होंडुरास सीमा के पास आते है। 2 सुरक्षा चौकियों को, $35 डॉलर प्रति व्यक्ति देना होता है। एक बस उन्हें होंडुरास ले जाती है, जहां से वे ग्वाटेमाला पहुंचने के लिए, एक और जंगल को, 6 घंटे पैदल चल कर पार करते हैं। और अगर डाकुओं ने देख लिया, तो आगे बढ़ने के लिए $40 डॉलर; मान लो जैसे कि एक…’सांप-सीढ़ी’ का खेल हो…लेकिन असलियत में। चोर या सिपाही, पैसे उतने ही लगेंगे; चौकी पर $40 डॉलर डालिए और आगे बढ़िए! कोस्टा रिका से मैक्सिको तक का खर्च? $2,300 डॉलर।
$ 800…निकारागुआ $ 700…होंडुरास $ 800 से मैक्सिको तक।

मैक्सिको में जाली दस्तावेज़ तैयार किए जाते हैं, जो अमेरिका में उनके काम आ सकते है; जैसे खेतों के मालिक अक्सर सस्ते कामगार पाने की लालच में, इन कागज़ात को स्वीकार कर लेते हैं। अमेरिकी-मैक्सिकन सीमा को नौ क्षेत्रों में विभाजित किया गया है। सबसे छोटा ‘एल सेंट्रो’ है, जो एरिज़ोना-कैलिफोर्निया सीमा के, पश्चिम में 70 मील तक फैला हुआ है और भारतीयों के बीच, काफी लोकप्रिय है। हालांकि कौन से रास्ते से जाए, ये निर्भर करता है ‘ट्रैवल एजेंट’ पर। अलग-अलग तस्कर अलग-अलग सीमावर्ती स्थान पहुंचाते है; जैसे ‘एल पासो’, ‘टोगलेस’, ‘बाजा कैलिफ़ोर्निया’ और सोनोरान रेगिस्तान। 
अवैध प्रवासियों में मौत आम है;
जनवरी 2016 में, पंजाब के 24 युवा, जो ‘डॉन्की फ्लाइट’ पर थे, नाव उलटने से पनामा तट के पास डूब गए। तस्करी के तरीके अकसर जानलेवा होते है। ब्रिटेन में अवैध रूप से प्रवेश करने वाले, 12 पंजाबियों को, मांस से भरे रेफ्रीजिरेटर कंटेनर के अंदर, अधमरे, थिठुरतें हुए पाया गया। 
39 अन्य एशियाई अवैध लोग के साथ वो अक्टूबर 2019 में ग्रेज़, इंग्लैंड के पास एक उसी तरह की बर्फीली ट्रक में दम घुटा गया। हरएक गैरकानूनी इमिग्रेशन के लिए, लगभग ₹30-50 लाख रुपए का खर्च आता है।
लेकिन ज़रा गौर कीजिएगा, अगर कोई 50 लाख खर्च कर सकता है, तो वो गरीब कैसे कहलाएगा? सच कहें, तो ये पंजाबी अच्छे पक्के घरों में हर सुविधा के साथ रहते है। फिर उन्हें अमेरिका जाने की क्याें पड़ी रहती है, वो भी ऐसे?

इंडिया टुडे सर्वे के अनुसान, 2013 में इसी तरह पहुंचे और आते ही राजनीतिक शरण का आवेदन किया, करीबन 23,000  22,967* (2018) अन्य भारतीयों की तरह, जिनके मामले अमेरिकी कानूनी प्रणाली के कतार में फंसे हुए है।
हालांकि भारतीय शरणार्थी इस कोशिश में, आधे से भी कम, 42.2% (2012-2017) ही सफल होते है और अधिकांश को भारत वापस भेज दिया जाता है। लेकिन ये आंकड़े, एल साल्वाडोर के 21% और होंडुरास के 22% सफलता की तुलना में, लगभग दोगुना है। जिन लोगों को धोखाधड़ी करते पाया जाता है, उन्हें न्यू मैक्सिको या ऑरेगोन के ख़ास जेलों में भेजा जाता है। अमेरिका से अवैध प्रवासियों की कतार बंद करने के दबाव में, ऐसा पहली बार हुआ जब मैक्सिको ने अक्टूबर 2019 में 311 भारतीयों को बोइंग 747 चार्टर करके निर्वासित किया। लेकिन इन दंडों के बावजूद, ये महत्वाकांक्षी युवा रुकते कहां हैं, अमरीकन लोग जैसे जीवन बिताने का सपना, उन्हें हमेशा पुकराते रहता है। पंजाब-हरियाणा में जो परिवार को विदेशों से पैसे मिलते है, उन्हें समृद्ध माना जाता है और इस दर्जे तक पहुंचने के लिए, वे अपने बच्चों को अकसर उकसाया करते हैं। ताकि वे अपने घरों को आलिशान बना सके, महंगे-महंगे सामान खरीद सके और अपने चौखट पर बड़ी सी एक SUV कार खड़ी कर सकें। उन्हें शायद कोई फर्क नहीं पड़ता, कि उनका बच्चा एक दूकान में कूली का काम कर रहा हो, बर्तन धो रहा हो या फिर किसी गुरुद्वारों में खाना खा रहा हो। जब तक वो US डॉलर कमा रहा हैं, तब तक परिवार का रुतबा बरकरार है।
प्यू रिसर्च सेंटर अध्ययन के मुताबिक, अमेरिका में 2017 तक, 100 लाख गैरकानूनी अप्रवासी थे, जिनमें 6.3 लाख* भारतीय हैं। इनमें वे लोग भी शामिल हैं, जिनका B1/B2 वीज़ा खत्म हो चुका है, लेकिन उन छात्रों को शामिल नहीं किया गया, जो अपने F1 का दुरूपयोग कर रहें हैं, ना ही जिनके H1-B वीजा का समय ख़तम हो चुका हैं। जाहिर है, सभी अप्रवासी चाहेंगे…ट्रम्प की दीवार योजना सफल होने से पहले ही, वे सीमा पार करने में सफल हो जाएं।

 

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